बिहार में अपराध की दुनिया का कुख्यात नाम संतोष झा। दरभंगा में हुए डबल इंजिनियर हत्याकांड के बाद चर्चा में आये सजायाफ्ता संतोष झा जिस तरह से लगातार लुट-हत्याओं के साथ अपराध की दुनिया में खुद को स्थापित किया वह कहीं ना कहीं प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण रहा और संतोष झा को जानने वालों के लिए अप्रत्याशित था। कभी सामान्य रूप से आम नागरिक की तरह जिन्दगी जीने वाला संतोष झा के अपराध की दुनिया में आने की कहानी पूरी तरह फ़िल्मी है, जिससे आज भी अधिकांश लोग अंजान हैं।

दबंग लुक के साथ गोरे चेहरे पर महंगा चश्मा, काले रंग की फुल टी-शर्ट और ब्रांडेड पैंट की शौक रखने वाला संतोष झा ना तो फिल्म अभिनेता है और न हीं कोर्इ वीवीआर्इपी। बल्कि वह कानून की नजर में सजायाफ्ता है, यह उत्तर बिहार का र्इनामी तथा बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी का चीफ है जिसके सिर पर हत्या, लूट, रंगदारी, भयादोहन, विस्फोटक अधिनियम तथा आर्म्स एक्ट के तहत लगभग में 29 से अधिक मामले दर्ज हैं। इस शख्स की पहचान कुछ ऐसी है की पुलिस कस्टडी में होने के वाबजूद सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, पश्चमी चंपारण, गोपालगंज, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, दरभंगा तथा शिवहर जिले की पुलिस को नाकोदम कर रखा है।

पिता की पिटार्इ के बाद माओवादियों की जमात में शामिल होने वाले संतोष की जिंदगी की कहानी भी बड़ी अजीब है। शिवहर जिले के पुरनहिया थाना अंतर्गत दोसितयां गांव निवासी संतोष झा के पिता चंद्रशेखर झा कभी गांव के हीं दबंग जमींदार परिवार से तालुक रखने वाले नवल किशोर यादव के जीप का ड्राइवर था। पंचायत भवन बनाने के सवाल पर ही संतोष झा के पिता चंद्रशेखर झा की गांव के उन दबंगों से ठन गयी, जिसके घर वह नौकरी कर रहे थे। बस इतनी सी बात पर दबंग जमींदार ने चंद्रशेखर झा की जमकर पिटार्इ की। पिता पर जमींदारों के जुल्म ने शांत संतोष के चेहरे पर बदले की चिंगारी जला दी। उसके बाद संतोष झा माओवादियों के खेमें में मिल कर बदला लेने की कसम खायी और वर्ष-2003 में जमींदार नवल किशोर यादव के घर पर माओवादियों ने हमला कर इरादे स्पष्ट कर दिये। अदौड़ी में बैंक लूट, तरियानी के नरवारा में बैंक लूटने जैसी वारदात के अलावे देकुली पुलिस पिकेट से हथियार लूट के मामले में भी संतोष का नाम उछला था।


पिता की पिटार्इ का बदला संतोष को इस कदर खौला दिया था कि उसने 15 जनवरी 2010 को अपने सहयोगियों के साथ सीतामढ़ी के राजोपटटी में पूर्व जिला पार्षद नवल किशोर यादव को उसके घर के बाहर गोलियों से भून दिया था। उसने उक्त हत्या को पिता की पिटार्इ का बदला बताया था। नक्सलियों से अलग होकर उसने बदला लेने के लिए उक्त हत्या को अंजाम दिया था। बाद के दिनों में नक्सलियों से उसका जुड़ाव भी बढ़ गया और उसने उससे अलग अपना संगठन बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी बना लिया। नक्सली गौरी शंकर झा की हत्या के मामले में भी संतोष मुख्य आरोपित है। 24 नवंबर 2011 को गौरी शंकर झा को उसके घर पर हमला करने के बाद गोलियों से भून दिया गया था। वर्ष-2005 में संतोष झा को एसटीएफ ने पटना के एक होटल से गिरफ्तार किया था। बाद में पांच साल तक जेल में रहने के बाद वह जमानत पर छूट कर खूनी खेल को जारी रखा। इसके बाद वर्ष-2012 में रांची के बुटी मोड़ से वह अपने सहयोगी मुकेश पाठक के साथ पूर्वी चंपारण जिले की पुलिस के हत्थे चढ़ा था।



दरभंगा के डबल इंजिनियर हत्याकांड के बाद पुलिस की गिरफ्त में आये संतोष झा जब 15 फरवरी 2015 की दोपहर जब सीतामढ़ी पुलिस की कस्टडी में बख्तरबंद वैन से बाहर निकला तो जिला मुख्यालय, डुमरा स्थित व्यवहार न्यायालय के पास सैकड़ों की तादाद में मौजूद भीड़ उसकी एक झलक पाने के लिए धक्का मुक्की पर उतारू था। जिस व्यक्ति के नाम से कंस्ट्रक्शन कंपनियां कांप उठती थी, वह कस्टडी में पूरे इत्मीनान से दबंग की तरह हाथ हिला कर भीड़ का अभिवादन कर रहा था।



17 फरवरी 2012 को मोतिहारी पुलिस की चुक के कारण कोर्ट से जमानत मिलने के बाद जेल से बाहर निकला यह व्यकित उसके बाद की जिंदगी में इतना खौफनाक चेहरा बन गया कि पुलिस को उसे पकड़ने के लिए एक लाख रुपये का इनाम घोषित करना करना पड़ा। मोतिहारी जेल से बाहर आने के बाद संतोष झा का लाइफ स्टाइल भी बदल गया। इसके बाद तो वह कर्इ आपराधिक वारदातों को अंजाम देने के बाद रंगदारी की रकम से दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की की राह गिनने लगा। सीतामढ़ी जिले की पुलिस के टाप टेन की सूची में नंबर वन संतोष झा की संपत्ति को जब्त करने की भी पुलिस ने कार्रवार्इ की है। पुलिस की माने तो संतोष झा ने सिर्फ रंगदारी की रकम से करीब 50 करोड़ से अधिक की संपत्ति अर्जित की है। पुलिस की तफ्तीस में यह बात सामने आयी है कि उक्त अपराधी के काठमांडू, जमशेदपुर, रांची, कोलकता में फ्लैट है तो उड़ीसा में उसके आलीशान होटल की भी चर्चा है। इतना हीं नहीं असम के गुवाहाटी में उसने करोड़ों की लागत से एक बड़ा स्कूल तक खोल रखा है, जिसको उसके खास सहयोगी मुकेश पाठक का पिता डील करता है। संतोष बडे़ ठाठ से अपने गूर्गों के माध्यम से कंस्ट्रक्शन कंपनी से रंगदारी की वसुली करता था। काठमांडू में भी उसने अपने व्यवसाय को रंगदारी के माध्यम से चमकाना शुरू किया था। बाद में सहयोगी चिरंजीवी की गिरफ्तारी के बाद से गिरोह को सबसे बड़ा झटका लगा। चिरंजीवी, गिरोह के शार्प शूटर विकास झा उर्फ कालिया के साथ छोटकी भिटठा से पकड़ा गया था। चिरंजीवी के पकड़े जाने के बाद हीं संतोष ने अपना ठिकाना बदल लिया और तभी से वह कोलकाता में अपने संबंधी के यहां छिप कर रहने लगा। बाद में रंगदारी की रकम से हीं उसने वहां दो फ्लैट भी खरीद लिया। संतोष के बारे में पुलिस ने बताया है कि कम उम्र के लड़कों को गिरोह में शामिल कर उसने रंगदारी के लिए हत्या कर दहशत फैला दिया था। हालांकि यह भी सच है कि संतोष झा के नाम पर कुछ छुटभैये अपराधियों ने भी रंगदारी मांगने का प्रचलन बना लिया था। तत्कालीन एसपी श्री सिन्हा कहते हैं कि संतोष झा के नाम का दुरूपयोग भी हुआ है। उसके नाम का इस्तेमाल कर भी अपराध किये गये हैं।