गुजरात दंगे के पोस्टर बॉय कैसे बनें राजनितिक 'मोहरे' - BJ BLOGGER

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मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

गुजरात दंगे के पोस्टर बॉय कैसे बनें राजनितिक 'मोहरे'



रामनवमी के बाद बिहार के कई जिले हिंसा के चपेट में आये। दो समुदाय आपस में हिंसक होकर सड़कों पर तांडव मचा रहे थे वहीं सदन में बैठे नेता दो खेमों में बंटकर बिहार में धार्मिंक हिंसा के नाम पर सुलग रही आग में पानी व घी दोनों देने का काम कर रहे थे। लेकिन देखते ही देखते अचानक हालत बदल जाते हैं। एससी/एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संसोधन की पहल के विरोध सड़कों पर आई भीड़ हिंसक हो जाती है। पलक झपकते प्राइम टाइम डिबेट चलने लगता है। राजनीती के मायने व नेताओं के बयान बदल जाते हैं। अख़बारों की सुर्खियां पिछले दिनों की ही तरह रहती है। न्यूज़ का हेडलाइन में थोड़ा-बहुत बदलाव होता है, दो समुदाय के जगह जातियों में बंटे दो समूह का संघर्ष झड़प लीड खबर बनती है।

नेतृत्वविहीन भीड़ का हिस्सा युवा हाथ में तलवार, भाला, डंडा आदी लेकर रंग-बिरंगे पट्टी को सर में बांध कर मीडिया के कैमरे में आने के लिए उताहुल नजर आता है। लॉ एंड आर्डर को भंग करने के नाम पर गोलीबारी होती है, लोग मरते हैं। जमकर लाठीचार्ज होता है, लोग घायल होते हैं। सैकड़ों एफआईआर होती है, हजारों गिरफ्तारी होती है। नेताओं के फिर से बयान छपते हैं। विपक्ष सरकार पर हमला करती है, सरकार से इस्तीफा मांगा जाता है। सरकारें गिर जाती है, नई सरकारें बन जाती है। लेकिन इन सब से फायदा किसका और नुकसान किसका यह बात वर्तमान परिदृश्य में सोचने व समझने की आवश्यकता है। नहीं तो हालात कुछ ऐसे हैं की अगले पोस्टर बॉय अशोक मोची और कुतुबुद्दीन अंसारी आप और हम देखते ही देखते कब बना दिए जायेंगे यह कोई नहीं बता सकता है।




दंगा... शब्द सुनते ही ‘गोधरा’ याद आता है। देश के सबसे बड़े दंगो में शुमार गुजरात के गोधरा में साल 2002 में हुई घटना इतिहास के पन्नों में सिमटी हुई है, लेकिन अक्सर वह वर्तमान को कुरेदती रही है। उपद्रवियों की उपद्रव ने किस तरह गुजरात को हिंसा के आग में धकेल दिया यह देश ने देखा। डेढ़ दशक से अधिक बीत चुके इस घटना को याद करके भी एकबारगी लोग सहम जाते है। किस तरह सड़क पर उतरी नेतृत्व विहीन भीड़ ने कत्लेआम मचाया हजारों जाने गई। हजारों घर, दुकानें, मंदिर, मस्जिद आग के हवाले करे दिए गये। जिसका जवाब ना तो आज शीर्ष में बैठे मठाधीशों के पास हैं ना ही उन चेहरों के पास जो राजनीति के मोहरे बन गये। गौरतलब है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक कोच में उपद्रवियों ने आग लगा दी थी, जिसमें अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों सहित 59 यात्री मारे गए थे। इस घटना के बाद दंगे भड़क उठे थे।















उस भीड़ में कुछ ऐसे भी चेहरे थे जो गुजरात दंगे का प्रतीक बन गये। वह नाम था अशोक परमार उर्फ अशोक मोची और कुतुबुद्दीन अंसारी का। आंखों में गुस्सा, सर पर भगवा पट्टी, हाथ में लोहे की छड़ और बैकग्राउंड में धधकती आग के साथ गरजता हुआ अशोक मोची की तस्वीर शायद की किसी अखबार के सुर्ख़ियों में ना रहा हो। दंगा, हिंसा जैसी घटनाओं में आज भी मोहरा बनाये जाने वाले लोगों के लिए यह तस्वीर ऊर्जा के संचार करने काम करती है।

वहीं आंखों में आंसू भरे,  और हाथ जोड़कर दया की गुहार लगाते तस्वीर जिसनें भी देखा दिल पसीज गया। वह तस्वीर कुतुबुद्दीन अंसारी का था। लेकिन अशोक मोची और न्याय की गुहार लगाते कुतुबुद्दीन अंसारी की तस्वीर जिस तरह से गुजरात दंगो के समय मीडिया की फ्रंट लीड बनी उस तरह से दंगे के बाद उन दो चेहरों व तस्वीरों की सच्चाई अख़बारों के किसी पन्ने पर जगह नहीं मिल सकी।


दरअसल, साल 2002 के गुजरात दंगों में सिर पर भगवा कपड़ा बांध और हाथ में रोड लिए हिंसा का चेहरा बने अशोक मोची और असहाय हालात में हाथ जोड़कर बेबस और लाचारी का चेहरा बने कुतुबुद्दीन अंसारी की वायरल हुई तस्वीर की सच्चाई कुछ और ही है। असल में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सामने आया कि न तो अशोक आरोपी है और न ही अंसारी पीड़ित। इस के पीछे की सच्चाई अशोक ने खुद लोगों से शेयर की और कहा की मेरा इस उस हिंसा से लेना-देना नहीं है।

42 वर्षीय अशोक ने दंगे के बाद सच्चाई सामने लाते हुए कहा की, ‘मैंने गलत जगह गलत एक्सप्रेशन दे दिए। मुझे एक पत्रकार द्वारा उस तरह से पोज देने को कहा गया था। मुझे यह अनुमान नहीं था की मैं इस तस्वीर से राजनीति का मोहरा बन जाउंगा। जबकि वहां हो रही हिंसा से मेरा कोई लेना-देना नहीं था। मुझसे उस तरह से पोज देने को कहा गया था और इस तस्वीर ने इन दंगों में आरोपी न होते हुए भी मुझे दंगों का चेहरा बना दिया।














अशोक ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि कैसे हिंदूवादी समूहों के लोग आ-आकर लोगों को भड़काते थे। ट्रेन में जले लोगों की फोटो दिखाते थे। फिर ये भी कहा कि मुस्लिमों और दलित समाज की एक ही स्थिति है। गुजरात में सरकारी नौकरी को कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर कर दिया गया. अब दलितों के लिए कुछ नहीं बचा। दंगों के वक़्त हमसे गलती हुयी थी, कुछ समझ नहीं पाए।

असहाय हालात में हाथ जोड़कर बेबस और लाचारी का चेहरा बने कुतुबुद्दीन अंसारी बताते है मेरी यह तस्वीर तब खींची गई जब मैं वह रैपिड ऐक्शन फोर्स के जवानों से रखियल एरिया में अपने परिवार को बचाने की अपील कर रहा था। हालाँकि मेरा मेरा परिवार तो बच गया लेकिन मुझे दंगा पीड़ित मुसलामानों का चेहरा बना दिया गया। कुतुबुद्दीन अंसारी को ये पहचान आज से दस साल पहले औरको दत्ता ने दी थी। उसके बाद से कुतुबुद्दीन अंसारी की ज़िदगी बदल गई। अंसारी की तस्वीर का बाद में कई जगह दुरुपयोग भी हुआ अहमदाबाद में 2008 के सीरियल ब्लास्ट के बाद आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन ने इसका गलत तरीके से उपयोग हुआ था।




उस दौरान अंसारी गुजरात छोड़ पश्चिम बंगाल की सरकार द्वारा दिए गए निमंत्रण के तहत कोलकाता चले गए थे लेकिन 2005 में वह परिवार समेत अहमदाबाद वापस लौट आए गुजरात वापसी के बाद अंसारी ने दंगे में अपनी प्रॉपर्टी के नुकसान के लिए अधिकारियों के चक्कर लगाए लेकिन किराए के मकान में रहने की वजह से सरकार के पास नुकसान हुई संपत्ति का कोई रेकॉर्ड नहीं था। जिसके कारण उन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिल सका। कुतुबुद्दीन अंसारी अब छोटी सी अपनी टेलर की दुकान चलाते हैं।

फोटो पत्रकार औरको दत्ता  बताते ही की हाथ बांधे, रूंधी आंखे, बदहवास कुदुबुद्दीन अगर गुजरात दंगो की पहचान न बनते तो शायद लोगों के खौफ की खबर मिलते मिलते बहुत देर हो गई होती।  फोटो पत्रकार औरको दत्ता  से 10 साल बाद मिले मुझे कुतुबुद्दीन अंसारी ने सारी शिकवे शिकायतें दूर करते हुए कहा था की उनसे मिलकर भरोसा हो गया है कि उन्होंने मुझे तकलीफ पहुंचाने के लिए तस्वीर नहीं ली थी। ये तो उनका काम था, मेरे सवालों का जवाब मिल गया है। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है।















असम और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार के पोस्टर में अंसारी की उसी तस्वीर का प्रयोग किया है। तस्वीर का कैप्शन है, 'क्या मोदी के गुजरात का मतलब सिर्फ विकास है? क्या आप असम को गुजरात बनाना चाहते हैं। फैसला आपके हाथ में है।' 2002 गुजरात दंगों के वक्त अंसारी की उम्र 29 साल थी और आंखों में आंसू भरे, दया की गुहार लगाते उनकी तस्वीर दंगों की बेंचमार्क फोटो की तरह प्रयोग की गई।


अशोक ने एक अंग्रेजी अखबार को बताया, 'खराब आर्थिक स्थिति की वजह से ही मेरी शादी नहीं हो पाई' अशोक अब हलीम नी खड़की में सड़क पर रहते हैं। दंगे के बाद उनके खिलाफ कई मामले दर्ज किए गए। उन्होंने बताया, 'निचली अदालत ने मुझे बरी कर दिया क्योंकि वे स्थानीय मुसलमानों से मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं ला सके। लेकिन पर किस्मत और राजनीति पलटी मारी किस्मत ने साथ नही दिया और सरकार ने मुझे बरी किए जाने के खिलाफ अपील की और अभी फैसला आना बाकी है।





अशोक मोची आज भी मोची का ही काम करते हैं। क़ुतुबुद्दीन भी अब शांत जीवन गुजार रहे हैं। वक़्त बीता, कुछ जख्म भी भरे। जिसके बाद 2014 में दोनों साथ ही एक मंच पर आये। गुलाब का फूल लिया-दिया।

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